आज की एक जटिल समस्या यह है, कि हम लिए गए संकल्प को क्यों नहीं पूरे कर पाते हैं। हम बुरी आदतों को कैसे सुधारें, समस्या की जड़ तक कैसे पहुंचे। आज के इस दौर में संकल्पों को पूरा करने के लिए समय की कमी और समर्पण के अभाव के कारण, सपने आकार लेने से पहले ही टूट जाते हैं। हर संकल्प अच्छा होता है क्योंकि इसके साथ सकारात्मक संभावनाएं ज्यादा होते हैं।
अक्सर लोग धूम्रपान को छोड़ने या वजन कम करने के लिए संकल्पित होते हैं और उसमें भी सफल भी हो जाते हैं। अगर सफलता नहीं मिलती तो निराश होने के बजाय पुनः नए जोश के साथ उस संकल्प को पूरा करने में जुट जाना चाहिए। यह सही है कि पुरानी आदतें आसानी से नई आदतों को नहीं पनपने देती। आपके अच्छे विचार और अच्छे कार्यक्रम मैदान छोड़ सकते हैं और ऐसा करने के लिए आपको हालात मजबूर भी कर सकते हैं।
लेकिन संकल्प का पहला उसूल है कि, उसकी शुरुआत खुरदरी होती है। लेकिन जमीन समतल तैयार करती है। बदलाव और नई दिनचर्या विकसित होना आसान नहीं है, लेकिन संकल्पों को पूरा कर पाना नामुमकिन भी नहीं है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि आत्मविश्वास और वचनबद्धता किसी भी संकल्प को पूरा करने का मुख्य साधन है। आपको यह मानना होगा कि आप बदल सकते हैं और उस बदलाव के लिए आपके भीतर पर्याप्त आत्मशक्ति है।
एक चीनी कहावत है, कि महापुरुषों के संकल्प होते हैं और दुर्बलों कि केवल इच्छाएं। महात्मा गांधी हों या विवेकानंद स्वामी, दयानंद सरस्वती हों या अचार्य तुलसी, इन सब की सफलताओं का राज यही रहा है, कि उनका हर प्रयास भीतरी संकल्प के साथ होता था। छोटे संकल्प अक्सर बड़े बदलाव की नींव रखते हैं।
हर महीने एक पौधा लगाना है, या हर रोज किसी अजनबी को मुस्कुराहट देना, संभवता यह आपके जीवन में भारी बदलाव ना ला सके, लेकिन फिर भी आपकी उस जिंदगी को बरकरार रख पाने में सफल होते हैं, जिसकी चाहा लगभग हर व्यक्ति के भीतर विद्यमान होती है।
हम जब भी शमशान भूमि पर किसी दिवंगत आत्मा की अंत्येष्टि में सम्मिलित होते हैं, तो वहां लेखा विभाग के हमसे जोड़ता है, कि प्रतिदिन हम कोई भी काम करें, हम संकल्पित ही होते हैं। जरूरत है मन में उत्पन्न होने वाले संकल्पों को आकार देने कि। ऐसा इसलिए क्योंकि इससे जिंदगी को बदलने और उससे बेहतर बनाने की आधार भूमि तैयार होती है।
ललित गर्ग

